जब कोई बात चले...
मुमकिन है की मैं कुछ रिवाज़ों को बदल डालूं, ना ये वक्क्त है उनका ना अब बर्दाश्त होता है....
Tuesday, February 12, 2013
Sunday, February 3, 2013
Thursday, January 3, 2013
चार परिंदे
कल रात वहाँ बस्ती में तूफ़ान-ए-खौफ़ था,
तूफ़ान गुज़र गया सहर-ए-बस्ती उजाड़ के|
नफ़रत की तेज़ हवाओं में साँसे सिमट गयीं,
किसको मिली जन्नत यूँ माहोल बिगाड़ के|
आरज़ू करते थे हाँथ रोटी के चार टुकड़े की,
लाए कहाँ से आज वो मज़हबी खंज़र निकाल के|
इरादे दहश्तगरदों के पोशीदा ना रहे अबकी,
ये लहू इंसाफ मांगेगा सियासी तख़्त उखाड़ के|
सुना है, किसी फिरंगी मौज़ का पानी चखा गया,
वरना ! वो चार परिंदे, यार थे अपनी बहार के|
Saturday, December 8, 2012
Sunday, November 25, 2012
Subscribe to:
Posts (Atom)




.bmp)