Thursday, January 3, 2013

चार परिंदे


कल रात वहाँ बस्ती में तूफ़ान-ए-खौफ़ था,
तूफ़ान गुज़र गया सहर-ए-बस्ती उजाड़ के|

नफ़रत की तेज़ हवाओं में साँसे सिमट गयीं,
किसको मिली जन्नत यूँ माहोल बिगाड़ के|

आरज़ू करते थे हाँथ रोटी के चार टुकड़े की,
लाए कहाँ से आज वो मज़हबी खंज़र निकाल के|

इरादे दहश्तगरदों के पोशीदा ना रहे अबकी,
ये लहू इंसाफ मांगेगा सियासी तख़्त उखाड़ के|

सुना है, किसी फिरंगी मौज़ का पानी चखा गया,
वरना ! वो चार परिंदे, यार थे अपनी बहार के|